At the outset.. বাট চ'ৰাতে

Welcome to my world..
I am not a writer nor a poet. Just trying to narrate some of my experiences .. I am usually comfortable in writing in Assamese, my mother tongue. Have written few blogs in English and have tried my hands in composing few poems in Hindi too.. My Hindi speaking friends may excuse me for my audacity to do so..

মোৰ জগতলৈ আদৰিছো...
কোনো কবি সাহিত্যিক মই নহয়, কিছুমান অভিজ্ঞতাৰ বৰ্ণনা মাথোন কৰিছো ইয়াত.. মাতৃভাষা অসমীয়াতে লিখি ভাল পাওঁ যদিও ইংৰাজীতো লিখিছো.. হিন্দী ভাষাতো দুটামান কবিতা লিখিবলৈ চেষ্টা কৰি চাইছো....

Translate

Showing posts with label Hindi. Show all posts
Showing posts with label Hindi. Show all posts

Wednesday, 31 October 2012

भारतीय नारा

मेरा दोस्त योरोप से लौटा
कूछ ही दिन हुआ
कहता है जगह है निराला
चाहिये सबको देखना|
फ्रांस, सुईजारलेन्ड, हलेन्ड, इंलेन्ड
या जर्मेनी का क्या कहना
एक बार नहीं देखा अगर
जीवन रह जायगा अधूरा|
जाने दो यार ,मैंने सोचा,
इनकी बातों में मत आना
अब तक शिमला ही नही देखा
श्रीनगर, दार्जिलिं या पुना|
छोटे मोटे गाँव या शहर
जहा रहता है देश मेरा
जब तक सबको नहीं देखा
कैसे लगाऊँ भारतीय नारा?

Friday, 26 October 2012

एक नाम....


हर शाम आठ बजे आता है मेरा दूधवाला
सर्दी हो या बर्षा, या हो मौसम सुहाना|

चाय अद्रकवाली या दही हर रोज बनता
एक रोज न आने से सब कुछ उल्टा-पूल्टा|

बोला एक दिन उसे, भाई नम्बर बता अपना
नम्बर लिया, फिर पुछा , क्या नाम लिखूँ तेरा?

हँस कर बोला, वह भोला-भाला, लिख दो दूधवाला
मैंने पूछा, अरे भाई , कुछ नाम भी तो तेरा होगा ?

कहा उसने , नामसे क्या होता, हूँ मैं दूधवाला,
फिर भी अगर चाहते हो, गोपाल नाम है मेरा |

चला गया वह गाड़ी चलाके, मैं सोच में डूबा,
लोगों के लिये वह है सिर्फ एक दूधवाला|

शायद किसीने नाम भी नहीं पुछा होगा उसका,
ह्म भी भूल जाते हैं, नाम होता है दूधवाला का|

पापा सा बन जाऊँगा


सभी मुझे तब प्यार करेंगे, जब अच्छा बन जाऊंगा
जल्दी-जल्दी पढ़ लिख मैं भी, पापा सा बन जाऊंगा

दीदी मेरी प्यारी-प्यारी, पढ़ने में आगे-आगे
कक्षा में अब्बल आती है, जल्दी से सोये जागे
आलस नहीं जरा भी उसमें, कार्य रोज का रोज करें
माने कहना सदा बड़ों का, देर न कर फौरन भागे
दीदी सी फुर्ती अपना कर, सुखद भविष्य बनाऊंगा

दादा उंगली पकर पास के, पार्क रोज  ले जाते हैं
दादा-मैं दोनो मस्ती में, छिपम-छेपाई करते हैं
गीत सुनाते हैं दादा जब, मैं झूमा करता हूँ
वही पार्क में दोस्त मेरे भी, मस्ती से भर जाते हैं
होकर बड़ा एक दिन मैं भी, कविता गीत सुनाऊँगा

मैं दादीका कचरा-बचरा, माँ की आँखों का तारा
लाड़ सभी करते, अंकल-आन्टी का हूँ प्यारा-प्यारा
बुआ के दिल की ध ड़कन, घोड़ा मेरा बन जाती हैं
मेरे घर के सब कहते हैं, मैं हूँ घर का उजियारा
टीचर कहती अच्छे अंकों से ही, अच्छा बन पाऊँगा

अब छूट्टी लग गई हमारी, नाना के घर जायेंगे
नाना-नानी , मामा-मामी, जगह-जगह ले जायेंगे
तरह-तरह का मन पसन्द, खाना पीना तो होगा ही
खेल-खेल, आवा-जाही में खुशियों से भर जायेंगे
दादा-दादी के आदर्शों पर चल, बड़ा कहाऊँगा

A poem by Janakavi Dr Raghunath Misra of Kota, Rajasthan